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कुछ लोग,

कुछ लोग उम्र भर हिसाब रखते रह गए रिश्तों का, मैंने दोस्तों को चुनकर ज़िंदगी ही ख़ूबसूरत कर ली।

फ़ासले सिमट से,

फ़ासले सिमट से गए मोहब्बत में उनकी, कल का अजनबी, आज आईना बन गया।

दर्द-ए-सितम

दर्द-ए-सितम कैसे बयाँ करें, ऐ हमसफ़र तुम्हें  ख़्वाबों में तराशता रहा तुम्हें लम्हे गुज़रते रहे।

क़रीब बैठा रहा

क़रीब बैठा रहा है वो शख़्स एक तस्वीर की तरह वक़्त के साथ अश्कों का क़ाफ़िला गुज़रता रहा।

तकलीफ़ देता है

तकलीफ़ देता है मुझको आजकल मुस्कुराना उनका हर मुस्कुराहट के पीछे छुपा कोई फ़साना देखता हूँ।

मुलाकातों का ये

मुलाकातों का ये सफ़र अब आम होने लगा मैं तुम्हारी हसीन यादों का ग़ुलाम होने लगा

इश्क़ की स्याही से

इश्क़ की स्याही से दास्ताँ-ए-मोहब्बत लिख दी हमने, फिर भी हज़ारों सवाल दस्तक देते हैं उनके ज़ेहन में।

सुलग रहा है

सुलग रहा है इक कारवां जेहन में ये मसला-ए-इश्क़ तो नहीं ए खुदा।

ज़रे-ज़रे की कर्ज़दार है ज़िंदगी

ज़रे-ज़रे की कर्ज़दार है ज़िंदगी,  तेरे इश्क़ की तलबगार है ज़िंदगी, टूटे ख़्वाबों की सौग़ात है ज़िंदगी, हर सहर एक नई तलाश है ज़िंदगी।

अजीब सिलसिला,

अजीब सिलसिला है दरमियां हमारे ए अजनबी शिकायतें भी बहुत है और बेइंतेहा मोहब्बत भी। 

किस-किस,

किस-किस से छुपाए तुम्हें हम ए हमसफर मेरी आंखों से रूह तक बस तुम ही तुम हो...

मदहोश,

मदहोश करती है मुझको मौजूदगी तुम्हारी मोहब्बत भरा ये दिल मुझसे संभलता नहीं।

जज़्बात बयां करते हैं,

जज़्बात बयां करते हैं अल्फ़ाज़ों में छुपी हर बात उनकी ख़ामोशी में कई राज़ गेहरे है अभी

उनकी,

उनकी गुस्ताख निगाहों ने तब्लीग़ ही कुछ यू की सोचे समझे बिना मैं ईमान महोब्बत पर ले आया

जेहेन में

जेहेन में झूठी वफ़ाओ का अलाप जलने दो अरसा गुज़र गया पलकों को भीगते भीगते। 

इतना भी न,

इतना भी न रूठो   तुम हमसे ए हमसफर, हर लम्हा हमें पराया सा लगने लगता है।

मंज़िले,

मंज़िलें कभी फ़ांसलो से तय नहीं होती जनाब रास्तों पर अक्सर टूटकर बिखरना भी पड़ता है। 

ख़ामोश पलकों,

ख़ामोश पलकों से बेहताशा मुस्कुराता है वो छलकती आँखों से दर्द कभी बयां नहीं होता

खुशियोँ भरा,

खुशियोँ भरा सफ़र देख फ़ासले भी मुस्कुराने लगे रोशन क्यूं है रास्ते नज़दीकियों का दौर है ग़ालिब...

इश्क़ में,

इश्क़ में तुम्हारे मैं रम जाऊँ कुछ इस तरह की अक्स मेरी आँखों में सिर्फ़ तुम्हारा आए नज़र।