जहाँ ख़्वाब उतरते है,

जहाँ ख़्वाब उतरते है वहां पर एक गुमनाम बसेरा मौजूद मेरा आज भी है, अपने ख्वाबों को तराशता फिरता हूं मैं हर गली हर शहर में, जो मिलेगा मुझे एक दिन जहाँ अनगिनत ख्वाबों की भीड़ उमड़ती आज भी है, मिलता नहीं मुझे मेरा ख़्वाब ए ज़िंदगी का मक़सद मेरे लाख़ यत्नों के बाद भी हाथ खाली के खाली मेरे आज भी हैं, थक सा गया हूं अब तो इंतज़ार करते करते अपने ख्वाबों का जिनके मिल जाने का एक ख़्वाब मेरी इन आँखों में मौजूद आज भी है...

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