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इक अरसा गुज़र,

इक अरसा गुज़र गया तुझको चाहते हुए ए मेरी ज़िंदगी और एक तू है जो आज भी बेखबर है मेरे बीते कल की तरह...

करके तुम्हारी ख्वाईश,

करके तुम्हारी ख्वाईश कौनसा गुनाह कर दिया हमने आजकल तो लोग इबादत में पूरी कायनात मांग लेते है अपने खुदा से...

उनकी चुभती हुई,

उनकी चुभती हुई यादों से कह दो अब मेरे जेहन में आया ना करें, हम तन्हा ही खुश है बेकार में रातों को जगाया न करें..

धुन,

धुन ज़िन्दगी की अक्सर गुनगुनाता हूं मैं  बेचैन दिल को अपने राहत दिलाता हूं मैं,  भूल जाता हूं तमाम दुख दर्द अपना जब  कभी अधूरी हसरतो की महफ़िल सजाता हूं मैं,  खड़ा रहता हूं साथ अपनी ज़िंदगी के सदा जीवन के हर एक पहलू को बखूबी समझाता हूँ मैं, फ़िरभी हर दफ़ा लड़ते झगड़ते हुए  खुदसे ही हर मर्तबा हार जाता हूं मैं...

Fact,

हमारा आज कितना भी अच्छा क्यूं ना हो  आने वाले कल हमेशा शिकायत करता है

सुविचार,

हमारा आज कितना भी अच्छा क्यूं ना हो परंतु हमारा आने वाला कल सदैव उसकी निंदा ही करता है...

तुम्हारी चाहतों,

तेरी चाहतों की बारिश में मैं जब भीग जाता हूं अंगिनत ख्वाइशे उमड़ने लगती है दिल में मेरे...