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मेरे अश्क़,

मेरे अश्क़ उनकी बेइंतेहा मोहोब्बत के गुलाम हो गए लड़ते झगड़ते यादों से उनकी जानें कब मेरी पलकों पर मेहमान हो गए...

छोटी सी ये ज़िंदगी,

छोटी सी ये ज़िंदगी समेटे हुए है  अंगिनत ख्वाइशों का दरिया,  बस एक तेरी चाहत है मुझको ए ज़िंदगी  वरना इस दुनियां में मेरा कुछ भी नहीं...

धीरे धीरे,

धीरे धीरे वो अपनी ज़िंदगी की खवाइशो के गुलाम बन गए आख़िर मिले भी तो वो तब मुझे जब तराशे हुए मोहोब्बत के नगीने से वो एक पत्थर बेजान बन गए...

उनके जज़्बात,

उनके जज़्बात ए दिल से बेइंतेहा दिलागी करली मैंने वो बात और है की मुझको उनका नाम तक मालूम नहीं...

सिलसिले,

सिलसिले ये चाहत ए मोहोब्बत तुम्हारी कम होती ही नहीं ए हसीं कभी कभी तो मैं तंग आकर तुम्हारी यादों से झगड़ पड़ता हूं...

ढूंढोगे मुझको तो,

ढूंढोगे मुझको तो एक नहीं हज़ार मिलेंगे मगर याद रखना ए हसीन मुझको छोड़कर सारे के सारे बस हुस्न के तलबगार मिलेंगे...

दीवारें,

ये सरहद की दीवारें क्या समझेंगी जज़्बात ए मोहोब्बत को मेरी ए खुदा आज़ाद ए इश्क़ का कत्ल करना तो इनकी आदत पुरानी है..