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लम्हों की दीवानगी,

"काश ज़मीन की गर्दिश रुक जाए लम्हों के लिए..  और तेरी धड़कन के सिवा कोई आवाज़ न हो"

उल्फत ए इश्क़

उल्फत ए इश्क़ हो गया है मुझे तुमसे ए हसीं सुना है इस मर्ज़ का इलाज़ भी सिर्फ़ तुम हो...

रफ़्तार,

रफ़्तार पकड़ने लगता है इश्क़ का दरिया मेरा जब ख़ामोशी से मेरे होंठो को चूम लेता है वो...

बहुत,

बहुत शर्मिला है अंदाज़ ए मोहोब्बत उसका ए खुदा फिरभी अपनी आगोश में लेकर मेरी धड़कनों को बढ़ा  देता है...

रातेँ छोटी,

रातेँ छोटी होने लगी है मोहोब्बत में अब तुम्हारी ए हमसफ़र सहर हो जाती है अब तो बस अपने ख्यालों में ही तराशते-तराशते हुए तुमको...

ख़ाली रहने लगा है,

ख़ाली रहने लगा है उनकी यादों का महल जब्से कैद हूं उनकी कसमों की सरहदों में

पुर्ज़ा पुर्ज़ा,

पुर्ज़ा पुर्ज़ा बिखर गया उनकी यादों का हर जगह  मेरी तकलीफों ने बड़े अदब से संभाला है मुझको...